शेख अफरोज हरदा।जिला चिकित्सालय हरदा में पदस्थ संविदा स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रियंका शारदे का अनुबंध राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM), मध्यप्रदेश द्वारा तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दिया गया है। इस कार्रवाई के बाद जिले से लेकर सोशल मीडिया तक बहस तेज हो गई है। एक ओर प्रशासन गंभीर आरोपों का हवाला दे रहा है, तो दूसरी ओर बड़ी संख्या में लोग इसे एकतरफा और आवाज दबाने वाली कार्रवाई बता रहे हैं।
प्रशासन का पक्ष: गंभीर शिकायतों के बाद कार्रवाई
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. एच.पी. सिंह से प्राप्त जानकारी के अनुसार, डॉ. प्रियंका शारदे के खिलाफ जिला अस्पताल हरदा में मरीजों से दुर्व्यवहार, प्रसव के लिए अनाधिकृत राशि मांगने और कर्तव्यों में लापरवाही की कई शिकायतें सामने आई थीं।
शिकायतों में आरोप लगाया गया कि डॉ. शारदे द्वारा सिजेरियन ऑपरेशन के बदले 8 हजार रुपये तक की अवैध मांग की गई। जांच समिति के निरीक्षण के दौरान अन्य नवजातों के परिजनों ने भी 5 हजार से 8 हजार रुपये तक राशि देने की बात कही।
प्रशासन का कहना है कि प्राप्त शिकायतों की जांच के बाद NHM ने यह कार्रवाई की है और इसे नियमसम्मत बताया जा रहा है।
NHM का आदेश और कानूनी तैयारी
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, मध्यप्रदेश द्वारा आदेश क्रमांक 130/2026/NHM, दिनांक 07 जनवरी 2026 को डॉ. प्रियंका शारदे का संविदा सेवा अनुबंध समाप्त किया गया।
इसके साथ ही NHM की लीगल शाखा ने मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में केविएट दाखिल करने की सूचना भी जारी की है। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि यदि डॉ. शारदे जबलपुर, इंदौर या ग्वालियर हाईकोर्ट बेंच में याचिका दायर करती हैं, तो संबंधित अधिवक्ताओं को पूर्व सूचना देना अनिवार्य होगा।
यह कदम प्रशासन की कानूनी सतर्कता को दर्शाता है।
दूसरी तस्वीर: निडर महिला डॉक्टर या सिस्टम की शिकार?
वहीं दूसरी ओर, डॉ. प्रियंका शारदे के समर्थन में भी आवाजें तेज़ हो रही हैं। समर्थकों का कहना है कि डॉ. शारदे कोई सामान्य डॉक्टर नहीं हैं। उन्होंने जिला अस्पताल हरदा में वर्षों तक सेवाएं देते हुए हजारों महिलाओं का सफल इलाज किया है। ग्रामीण, गरीब और जटिल प्रसव मामलों में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा है।
समर्थकों के अनुसार, डॉ. शारदे की असली “गलती” यह थी कि उन्होंने स्वास्थ्य सेवाओं की खामियों पर खुलकर सवाल उठाए। उन्होंने न सिर्फ जिला अस्पताल बल्कि प्रदेश और देश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर अपनी बात बेबाकी से रखी।
सिस्टम से टकराव बना वजह?
डॉ. शारदे ने कई बार अस्पतालों में संसाधनों की कमी, अनियमितताओं और प्रशासनिक लापरवाही को लेकर खुलकर आवाज उठाई।
उनका मानना रहा कि यदि डॉक्टर ही चुप रहेंगे, तो सरकारी अस्पतालों की हालत कभी नहीं सुधरेगी।
समर्थकों का कहना है कि सिस्टम से सीधे टकराना एक महिला डॉक्टर को भारी पड़ गया। हालांकि वे कभी डरकर पीछे नहीं हटीं और अपने कर्तव्य से समझौता नहीं किया।
महिला और सामाजिक पृष्ठभूमि पर भी सवाल
यह मामला अब महिला सशक्तिकरण और सामाजिक न्याय से भी जोड़ा जा रहा है। सोशल मीडिया पर यह चर्चा तेज है कि कहीं SC, ST और OBC वर्ग की महिलाओं को आगे बढ़ने से रोकने की मानसिकता तो इस कार्रवाई के पीछे नहीं है।
हालांकि प्रशासन ने इस तरह के आरोपों को निराधार बताया है।
सोशल मीडिया पर दो धड़े
डॉ. प्रियंका शारदे के खिलाफ कार्रवाई के बाद सोशल मीडिया दो हिस्सों में बंट गया है।
एक वर्ग कार्रवाई को सही ठहरा रहा है, तो दूसरा वर्ग इसे एकतरफा, जल्दबाज़ी और महिला डॉक्टर की छवि धूमिल करने की कोशिश बता रहा है।
लोग सवाल पूछ रहे हैं—
• क्या सरकारी सिस्टम की कमियां उजागर करना अपराध है?
• क्या सुधार की मांग करना अनुशासनहीनता है?
• क्या जांच पूरी तरह निष्पक्ष थी?
फैसले पर पुनर्विचार की मांग
समर्थकों का कहना है कि यदि आरोप हैं तो पारदर्शी और निष्पक्ष सुनवाई होनी चाहिए थी। एकतरफा कार्रवाई से न केवल एक डॉक्टर का करियर प्रभावित हुआ है, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी सवाल खड़े हुए हैं।
फिलहाल यह मामला केवल एक संविदा समाप्ति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य सिस्टम, जवाबदेही और सच बोलने की कीमत पर बहस का केंद्र बन चुका है।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि डॉ. प्रियंका शारदे आगे क्या कानूनी कदम उठाती हैं और क्या प्रशासन अपने निर्णय पर पुनर्विचार करेगा।
