जनप्रतिनिधि बनाम लापरवाही तंत्र: एकलव्य विद्यालय में विधायक अभिजित शाह का हस्तक्षेप, सिस्टम की पोल खुली

शेख अफरोज हरदा। एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय में व्याप्त अव्यवस्थाओं के खिलाफ विद्यार्थियों की आवाज ने जब प्रशासन का ध्यान खींचा, तब यह मामला केवल एक विद्यालय की समस्या न रहकर पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल बन गया। दिनांक 17 जनवरी 2026 को प्रातः लगभग 10 बजे विद्यालय के विद्यार्थियों द्वारा सामूहिक रूप से अपनी समस्याओं को लेकर कलेक्टर महोदय से मिलने का प्रयास इसी अनदेखी का परिणाम था।


सोडलपुर के पास प्रशासन द्वारा विद्यार्थियों को रोककर समझाइश दी गई और समस्याओं के समाधान का आश्वासन देकर उन्हें विद्यालय वापस लाया गया। यहीं से इस मामले में जनप्रतिनिधि बनाम लापरवाही तंत्र की तस्वीर साफ होने लगी। सूचना मिलते ही माननीय विधायक श्री अभिजित शाह स्वयं विद्यालय पहुंचे और प्रशासनिक अधिकारियों, अभिभावकों एवं सामाजिक प्रतिनिधियों की मौजूदगी में भंडारण कक्ष और अन्य व्यवस्थाओं का निरीक्षण किया।

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निरीक्षण में सामने आए तथ्य किसी भी संवेदन शील समाज को झकझोर देने वाले थे। बच्चों के लिए संग्रहित आटा, चावल और पोहा की बोरियों पर न तो किसी कंपनी या ब्रांड का नाम था और न ही एक्सपायरी डेट दर्ज थी। लगभग 95 पैकेट नमकीन एक्सपायरी डेट पार पाए गए। बेसन के पैकेट चूहों द्वारा कुतरे हुए मिले, जो यह दर्शाता है कि भंडारण व्यवस्था पूरी तरह भगवान भरोसे चल रही थी।

यहां सवाल सिस्टम से उठता है—यदि नियमित निरीक्षण होते, तो क्या ऐसी स्थिति बनती? क्या संबंधित विभागों की जिम्मेदारी केवल कागजों तक सीमित रह गई है?

विधायक अभिजित शाह ने केवल निरीक्षण कर औपचारिकता नहीं निभाई, बल्कि बच्चों को परोसे गए नाश्ते की गुणवत्ता को परखने के लिए उनके साथ स्वयं बैठकर दलिया खाया। यह कदम एक जनप्रतिनिधि की संवेदनशीलता और जिम्मेदारी को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर यह तंत्र की निष्क्रियता पर करारा तमाचा भी है।

भोजन के बाद पेयजल व्यवस्था का निरीक्षण किया गया, जहां स्थिति और भी भयावह पाई गई। प्रथम तल पर स्थित पानी की टंकियों में काई जमी थी, पानी में मेंढक तैरते नजर आए, टंकियों के ढक्कन खुले थे और महीनों से सफाई नहीं की गई थी। पानी से दुर्गंध आ रही थी, फिर भी वही पानी बच्चों द्वारा उपयोग में लाया जा रहा था। यह लापरवाही नहीं, बल्कि सीधे तौर पर बच्चों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ है।

अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि विधायक के पहुंचने से पहले तक यह सब क्यों चलता रहा? जिन अधिकारियों और कर्मचारियों पर निगरानी की जिम्मेदारी थी, वे क्या कर रहे थे? क्या जनप्रतिनिधि के हस्तक्षेप के बिना सिस्टम अपने आप जागने को तैयार नहीं?

इस पूरे प्रकरण में विधायक अभिजित शाह का सक्रिय और जमीनी हस्तक्षेप एक उदाहरण बनकर सामने आया है, जबकि लापरवाही तंत्र पूरी तरह कटघरे में खड़ा है। विद्यार्थियों और अभिभावकों ने विधायक की तत्परता की प्रशंसा करते हुए दोषियों पर कड़ी कार्रवाई और स्थायी सुधार की मांग की है।

अब निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं—क्या यह मामला केवल निरीक्षण तक सीमित रहेगा, या लापरवाही तंत्र पर वास्तव में कार्रवाई होगी?